गति में रहते हुए भी स्थिरता

सारा ब्रह्मांड निरंतर गति में है, फिर भी उसमें एक अद्भुत व्यवस्था और संतुलन दिखाई देता है। पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा कर रही है। चंद्रमा अपनी गति से चल रहा है—फिर भी पृथ्वी पर जीवन व्यवस्थित रूप से फल-फूल रहा है।

यही ‘समवस्थित’ का मूल विचार है:

“गति में रहते हुए भी भीतर से स्थिर रहना और निरंतर परिवर्तन के बीच अपना संतुलन बनाए रखना।”

समवस्थित होने का अर्थ जड़ या रुक जाना नहीं है, बल्कि तीव्र गति के बीच भी अपनी व्यवस्था, संतुलन और दिशा को अक्षुण्ण (अडिग) रखना है।

जीवन लगातार बदलता रहता है—परिस्थितियाँ बदलती हैं, रिश्ते बदलते हैं, कार्यक्षेत्र बदलते हैं, शरीर बदलता है और समय बदलता है। हम इन बाहरी परिवर्तनों को रोक नहीं सकते, लेकिन हम अपने आंतरिक जीवन को इस तरह व्यवस्थित कर सकते हैं कि इन थपेड़ों के बीच भी हमारा मानसिक संतुलन न बिगड़े।

इसलिए जीवन का यह शाश्वत समीकरण बनता है:
व्यवस्था + संतुलन + गति = समवस्थित जीवन

इसके विपरीत, जब जीवन इस सूत्र से भटकता है:
अव्यवस्था + असंतुलन + ठहराव = समस्या

पृथ्वी अत्यधिक तीव्र गति से घूम रही है, फिर भी हमें उस गति के बीच एक अचूक स्थिरता का अनुभव होता है। इसी तरह, एक सजग मनुष्य भी जीवन की तीव्र भागदौड़ में आगे बढ़ते हुए, परिस्थितियों के अनुरूप बदलते हुए और अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए अंदर से पूरी तरह संतुलित और स्थिर रह सकता है।

यही वास्तविक अर्थों में ‘समवस्थित’ होना है।


सरल मंत्र जीवन के अनुभवों, विचारों और उन सरल बातों को समझने का एक प्रयास हैं, जो हमारी समस्याओं को देखने और जीवन को थोड़ा सरल बनाने में हमारी मदद कर सकती हैं। अच्छी बात जहाँ से मिले, उसे सीख लेना चाहिए।

हिंदी और अंग्रेज़ी में आठ पुस्तकों के लेखक। चार दशकों से अधिक के व्यावसायिक अनुभव, यात्राओं और जीवन के विविध अनुभवों से निकली उनकी समझ ही सरल मंत्रों का आधार है।

सरल मंत्र जीवन के अनुभवों, विचारों और रोजमर्रा की परिस्थितियों से निकली ऐसी सरल बातें हैं, जो हमें जीवन को थोड़ा बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकती हैं।

हर समस्या का कोई न कोई रास्ता हो सकता है। कई बार समाधान हमारे आसपास ही होता है, लेकिन हम उसे देख नहीं पाते। एक छोटा-सा विचार भी कभी-कभी हमारी सोच बदल सकता है और किसी कठिन परिस्थिति को समझने का नया रास्ता दिखा सकता है।

सरल मंत्र किसी धर्म, व्यक्ति या परंपरा तक सीमित नहीं हैं। अच्छी बात जहाँ से मिले, उसे सीखना चाहिए और जीवन में उपयोगी लगे तो अपनाना चाहिए।

सरल मंत्र का उद्देश्य उपदेश देना नहीं, बल्कि जीवन को समझने और थोड़ा सरल बनाने का प्रयास है।

रिश्ता न भी रहे, अपने दुश्मनों के लिए भी सुलह का द्वार खुला रखना चाहिए।

दुश्मनी किसी से होनी ही नहीं चाहिए। लेकिन यदि किसी बात पर झगड़ा इतना बढ़ जाए कि संबंध खराब हो जाएँ, तब भी सुलह के रास्ते बंद नहीं करने चाहिए।गुस्से और अहंकार में हम कभी-कभी यह तय कर लेते हैं कि अब जिंदगी में इस व्यक्ति की शक्ल भी नहीं देखेंगे। लेकिन जीवन हमेशा हमारी योजना के अनुसार नहीं चलता। कभी ऐसा समय भी आ सकता है जब वही व्यक्ति किसी परिस्थिति में हमारे काम आ सकता था। तब हमें यह याद आता है कि हमने अपने गुस्से और अहंकार में वापस आने के सारे रास्ते खुद ही बंद कर दिए थे।

हो सकता है कि हमें उसकी कभी जरूरत न पड़े, फिर भी सुलह का द्वार खुला रखना चाहिए। जिंदगी तनाव और नफरत में बिताने के लिए नहीं है। नफरत से कुछ हासिल नहीं होता, जबकि माफ कर देने से मन हल्का होता है और सुलह की संभावना बनी रहती है।