Sare Jahan Se Achha

Sare Jahan Se in Hindi by Dr. Allam Iqbal
Sari Jahan Se Achha in English Romanized by Dr. Alla Iqbal

सारे जहाँ से अच्छा

Sare Jahan Se Achha

सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलिस्ताँ हमारा।

ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा।

परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का
वो संतरी हमारा, वो पासबाँ हमारा।

गोदी में खेलती हैं इसकी हज़ारों नदियाँ
गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जिनाँ हमारा।

ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा।

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्ताँ हमारा।

यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा।

इक़बाल! कोई महरम अपना नहीं जहाँ में
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा।

Sare jahan se achha Hindostan hamara
Hum bulbulen hain iski, ye gulistan hamara.

Gurbat mein hon agar hum, rehta hai dil watan mein
Samjho wahin humein bhi, dil ho jahan hamara.

Parbat woh sabse ooncha, hamsaya aasman ka
Woh santari hamara, woh pasban hamara.

Godi mein khelti hain iski hazaron nadiyan
Gulshan hai jinke dam se rashk-e-jinan hamara.

Ae aab-e-rood-e-Ganga! woh din hai yaad tujhko
Utra tere kinare jab karwan hamara.

Mazhab nahin sikhata aapas mein bair rakhna
Hindi hain hum, watan hai Hindostan hamara.

Yunan-o-Misr-o-Roma sab mit gaye jahan se
Ab tak magar hai baqi naam-o-nishan hamara.

Kuch baat hai ki hasti mitti nahin hamari
Sadiyon raha hai dushman daur-e-zaman hamara.

Iqbal! koi mahram apna nahin jahan mein
Maloom kya kisi ko dard-e-nihan hamara.

सारे जहाँ से अच्छा — इतिहास

sare jahan se achha by iqbal

“सारे जहाँ से अच्छा” मूल रूप से एक उर्दू देशभक्ति कविता है, जिसे मुहम्मद इक़बाल (अल्लामा इक़बाल) ने 1904 में लिखा था। इसका मूल नाम “तराना-ए-हिंदी” (Tarana-e-Hindi) था, जिसका अर्थ लगभग “हिंदुस्तान का तराना/गीत” है।

1. 1904 में रचना

उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। इक़बाल लगभग 27 वर्ष के थे और उन्होंने यह कविता भारतीय बच्चों के लिए एक देशभक्ति गीत के रूप में लिखी थी। कविता में हिंदुस्तान की प्राकृतिक सुंदरता, नदियों, पहाड़ों और सांस्कृतिक एकता की प्रशंसा की गई है।

इसकी शुरुआती पंक्तियाँ थीं:

“सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा,
हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलिस्ताँ हमारा।”

2. पहली बार कहाँ प्रकाशित हुई?

कविता पहली बार 16 अगस्त 1904 को लखनऊ से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका इत्तेहाद (Ittehad) में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका एक संस्करण ज़माना पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ।

3. इक़बाल ने इसे सार्वजनिक रूप से कब सुनाया?

1904 के बाद इक़बाल ने इसे लाहौर के Government College में सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया। उस समय यह कविता तेजी से लोकप्रिय हुई और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय भावना व्यक्त करने वाले गीतों में शामिल हो गई।

विशेष रूप से यह पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण बनी:

“मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्ताँ हमारा।”

इसमें उस समय के भारत के लोगों को धर्म से ऊपर एक साझा भारतीय पहचान के रूप में देखने की भावना दिखाई देती है। IGNOU के भारतीय राजनीतिक चिंतन संबंधी अध्ययन-सामग्री में भी 1904 के इक़बाल को राष्ट्रवाद और हिंदू-मुस्लिम एकता के संदर्भ में चर्चा किया गया है।

4. स्वतंत्रता आंदोलन में लोकप्रियता

समय के साथ “सारे जहाँ से अच्छा” ब्रिटिश शासन के विरोध और भारतीय देशभक्ति का लोकप्रिय गीत बन गया।

महात्मा गांधी भी इसे गाया करते थे। Indian Express के अनुसार गांधी ने इसे यरवदा जेल में भी गाया था।

इस तरह एक ऐसी कविता, जो मूलतः बच्चों के लिए लिखी गई थी, धीरे-धीरे भारतीय राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन गई।

5. बाद में इक़बाल की विचारधारा में परिवर्तन

यह इतिहास का सबसे रोचक हिस्सा है।

1904 में लिखे “तराना-ए-हिंदी” में इक़बाल की पहचान हिंदुस्तान और उसकी साझा संस्कृति से जुड़ी दिखाई देती है।

लेकिन कुछ वर्षों बाद उनकी राजनीतिक और दार्शनिक सोच में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। 1910 में उन्होंने “तराना-ए-मिल्ली” लिखा। इसमें “हमारा वतन हिंदुस्तान” की जगह व्यापक मुस्लिम उम्मत/मिल्लत की अवधारणा सामने आती है।

बाद में 1930 के इलाहाबाद अधिवेशन में उनके भाषण ने मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की विचारधारा को प्रभावित किया, जिसे आगे चलकर पाकिस्तान के निर्माण से जोड़ा गया।

इसलिए 1904 के “सारे जहाँ से अच्छा” और बाद के इक़बाल के राजनीतिक विचारों को एक ही समय की सोच मानना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।

6. आज भारत में इसका महत्व

आज “सारे जहाँ से अच्छा” भारत के सबसे लोकप्रिय देशभक्ति गीतों में से एक है। यह भारतीय सैन्य समारोहों और विशेष रूप से Beating Retreat में भी बजाया जाता है।

आज जो धुन सबसे अधिक प्रसिद्ध है, वह पंडित रवि शंकर से जुड़ी है। उन्होंने पुराने संगीत को अधिक गतिशील रूप दिया और उसे लोकप्रिय सैन्य/देशभक्ति प्रस्तुति के अनुरूप बनाया।

एक महत्वपूर्ण बात

“सारे जहाँ से अच्छा” भारत का राष्ट्रीय गान नहीं है।
भारत का राष्ट्रीय गान “जन गण मन” है और राष्ट्रीय गीत “वंदे मातरम्” है।

“सारे जहाँ से अच्छा” की विशेषता यह है कि यह 1904 में ब्रिटिश भारत के समय लिखा गया एक देशभक्ति गीत था, जो आज भी भारतीय सांस्कृतिक और सैन्य परंपरा में जीवित है।

और शायद इसकी सबसे यादगार पंक्ति आज भी वही है:

“मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्ताँ हमारा।”