Samvasthit

वैश्विक दर्शन से जुड़ाव: चीनी परंपरा का ‘यिन-यांग’ सिद्धांत

दिलचस्प बात यह है कि भारतीय मनीषा का यह विचार चीनी दार्शनिक परंपरा से भी गहराई से जुड़ता है। प्रसिद्ध दार्शनिक ग्रंथ ‘झूजी युलेई’ (Zhuzi Yulei) में एक सूक्ति आती है:

“靜中有動,動中有靜” (Jìng zhōng yǒu dòng, dòng zhōng yǒu jìng)
अर्थ: “स्थिरता के भीतर गति है, और गति के भीतर स्थिरता है।”

चीनी दर्शन की इस अभिव्यक्ति के दो पहलू हमारे जीवन को परिभाषित करते हैं:

  1. 動中之靜 (Dòng zhōng zhī jìng) — गति के भीतर स्थिरता: जब बाहर जीवन में तीव्र हलचल और बदलाव हो रहे हों, तब भी भीतर एक गहरे मौन और संतुलन को बनाए रखना। यही ‘समवस्थित’ होने की कला है।
  2. 靜中之動 (Jìng zhōng zhī dòng) — स्थिरता के भीतर गति: जब बाहर सब कुछ शांत और स्थिर दिखे, तब भी भीतर वैचारिक, रचनात्मक और आध्यात्मिक चेतना का निरंतर चलते रहना।

“मनुष्य के जीवन में कई बार बड़े उतार-चढ़ाव आते हैं। अनुकूल परिस्थितियां तो हर कोई संभाल लेता है, लेकिन जो व्यक्ति गंभीर परेशानियों, मानसिक तकलीफों और कठिन परिस्थितियों के बीच भी अंदर से विचलित नहीं होता, वही वास्तव में ‘समवस्थित’ है।”

यह अवस्था दुखों से भागने की नहीं, बल्कि संकटों के बीच भी अपनी आंतरिक शांति, विवेक और दिशा को बनाए रखने की क्षमता है।


“समवस्थित वह चेतना या अवस्था है, जिसमें जीवन निरंतर गति और परिवर्तन के चक्र में रहते हुए भी अपनी आंतरिक व्यवस्था, संतुलन और स्थिरता को बनाए रखता है।”